
यह नवम्बर 2000 की बात है जब सब लोग कोरोना महामारी की दहशत में थे। समाज का एक बड़ा हिस्सा गहरे अवसाद और तनाव के दौर से गुज़र रहा था। लोग घर से बाहर निकलने से भी डर रहे थे। जागरण, जुलूस-झांकियां, ऑर्केस्ट्रा ही नहीं सरकारी स्तर पर भी सांस्कृतिक गतिविधियां ठप्प पड़ी थी। पूरी तरह कलात्मक मजदूरी पर निर्भर गरीब कलाकार, खास तौर पर संगतकार और रंगकर्मी आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे। बार-बार गुहार लगाने के बाद भी जब सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया, तो जाने-माने रंगकर्मी एवं थियेटर प्रोमोटर विश्वदीपक त्रिखा के नेतृत्व में रोहतक के कलाकारों ने खुद से एक पहलकदमी लेने का फैसला किया। इसी पहलकदमी के तहत घरफूंक थियेटर फेस्टिवल की शुरुआत हुई और शहर में हर सप्ताह एक नाटक का मंचन होने लगा।
इस कड़ी के पहला नाटक के रूप में भोरेरे आशाएं यानी ‘सुबह की उम्मीद’ को चुना गया। नाटक कोरोना में अपने पिता को खोने के बाद फिर से ज़िंदगी की शुरुआत करने वाली एक महिला दुकानदार की कहानी पर आधारित था और बंगाली भाषा में था। नाटक की प्रस्तुति के लिए पश्चिम बंगाल की अभिनेत्री मोनालिसा को बुलाया गया था। हिंदी में न होने के बावजूद नाटक बेहद सफल रहा और दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद लिया। इस से उत्साहित होकर शुरू हुआ यह आयोजन आज भी बदस्तूर जारी है।
घरफूंक का आरंभिक उद्देश्य कोरोना महामारी के बाद शहरवासियों को स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध करवाते हुए उन्हें अवसाद और निराशा से बाहर निकालना था। इसका दूसरा उद्देश्य बंद पड़ी सांस्कृतिक गतिविधियों को शुरू करना था, ताकि बाकी लोग भी हौसला करें, आयोजन शुरू होने और कलाकारों को काम मिलना शुरू हो। इसके अलावा इसके पीछे, नाटकों के माध्यम से नई पीढ़ी को संवेदनशील बनाने और उनमें इंसानी गुणों का विकास करने के साथ-साथ एक स्वस्थ सांस्कृतिक माहौल बनाना भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा। इस आयोजन को रोहतक के कलाप्रेमियों का ही नहीं, देशभर के नाट्यकर्मियों का भरपूर सहयोग मिला। बंगाल, राजस्थान, पंजाब, यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड और दिल्ली आदि से अनेक प्रतिष्ठित नाटक ग्रुप घरफूंक में अपनी प्रस्तुति देने आए, वह भी बिल्कुल मुफ्त में।
घरफूंक थियेटर फेस्टिवल की ज़िम्मेदारी विश्वदीपक त्रिखा के नेतृत्व में सप्तक और हिपा जैसी संस्थाओं ने उठाई हुई है, जिसमें पठानिया वर्ल्ड कैंपस के अंशुल पठानिया का नैतिक समर्थन बहुत महत्वपूर्ण है। शुरू में घरफूंक का आरंभिक उद्देश्य कोरोना महामारी के बाद शहरवासियों को स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध करवाते हुए उन्हें अवसाद और निराशा से बाहर निकालना था। इसका दूसरा उद्देश्य बंद पड़ी सांस्कृतिक गतिविधियों को शुरू करना था, ताकि बाकी लोग भी हौसला करें, आयोजन शुरू होने और कलाकारों को काम मिलना शुरू हो। इसके अलावा इसके पीछे, नाटकों के माध्यम से नई पीढ़ी को संवेदनशील बनाने और उनमें इंसानी गुणों का विकास करने के साथ-साथ एक स्वस्थ सांस्कृतिक माहौल बनाना भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा। इस आयोजन को रोहतक के कलाप्रेमियों का ही नहीं, देशभर के नाट्यकर्मियों का भरपूर सहयोग मिला। बंगाल, राजस्थान, पंजाब, यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड और दिल्ली आदि से अनेक प्रतिष्ठित नाटक ग्रुप घरफूंक में अपनी प्रस्तुति देने आए, वह भी बिल्कुल मुफ्त में।के नाम से शुरू हुए इस आयोजन का घरफूंक नाम पड़ने की भी रोचक गाथा है। आरम्भ में शहर के लोगों को स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध करवाने के लिए राज्य के कला एवं संस्कृति विभाग, राज्य कला परिषद, नगर निगम और ज़िला प्रशासन से इस तरह का कोई नियमित नाट्य आयोजन करवाने की प्रार्थना की गई थी। पर कहीं से कोई सहायता नहीं मिली और त्रिखा बिना किसी सरकारी या अकादमिक सहायता के यह आयोजन करते रहे। इसी बीच एक दर्शक ने कहा कि आखिर यह घरफूंक कितने दिन चलेगा? बस, त्रिखा ने मंच से ऐलान कर दिया, कि जब तक लोग देखने आएंगे, वे घरफूंक थियेटर को बंद नहीं होने देंगे, और इसका नाम घरफूंक हो गया। यह आयोजन कलाकारों द्वारा खुद के खर्चे से करवाया जाता है। सभागार का किराया, लाईट-साउंड व कलाकारों के खाने-ठहरने आदि का खर्च सप्तक और हिपा के द्वारा उठाया जाता है, जबकि रिहर्सल, कॉस्ट्यूम्स, आने-जाने आदि के खर्च का वहन खुद नाटक प्रस्तुत करने वाले कलाकार करते हैं। लोग आते हैं, नाटक देखते हैं, तारीफ भी करते हैं लेकिन आर्थिक सहयोग, जिस के बिना किसी भी आयोजन का लगातार चलना सम्भव नहीं है, न के बराबर रहता है। कभी-कभार कोई नाट्य प्रेमी कुछ सहयोग कर देता है, अन्यथा सारा खर्च नाटक करने व करवाने वाले कलाकार ही उठाते हैं।
- अविनाश सैनी




