
- डॉ. रेनू यादव
आज की बदलती जीवनशैली हमारी सेहत पर गहरा असर डाल रही है। हमारा खान-पान, खाने-पीने की आदतें, प्रदूषण, तनाव और आनुवांशिक (जीनोमिक) कारक मिलकर कई तरह की बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं। शहरीकरण, गतिहीन जीवन, जंक-फूड तथा बाहर खाने की प्रवृत्ति से हमारी दिनचर्या काफ़ी बदल गई है। अब घर के बने साधारण भोजन का प्रयोग कम होता जा रहा है, जबकि पैकेज्ड, फ़्राइड व अधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ गया है। खेलकूद, व्यायाम व दूसरी शारीरिक गतिविधियाँ कम हो गई हैं और नींद की कमी व तनाव की समस्या बढ़ गई है। इसके चलते भारत में भी अब जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ (lifestyle diseases) तेज़ी से बढ़ रही हैं, जिनका कारण सिर्फ वायरस-बैक्टीरिया नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या भी है।
खान-पान, गलत आदतों व प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव

बाहर के भोजन, फ़ास्ट-फूड, मीठे-शक्करयुक्त पेय, ट्रांस-फैट तथा संतृप्त वसा की वजह से मोटापा, उच्च कोलेस्ट्रॉल और मधुमेह जैसे रोग बढ़ रहे हैं। खान-पान की बुरी आदतें, जैसे अनियमित भोजन, बीच-बीच में स्नैकिंग, नींद की कमी और इमोशनल ईटिंग (बिना भूख के, तनाव, चिंता, उदासी या बोरियत आदि इमोशनल कारणों के चलते खाना, जो आमतौर पर हाई कैलोरी, अधिक वसा व शुगर वाला होता है) का मेल भी स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। वातावरण में बढ़ता वायु प्रदूषण (विशेषकर पीएम 2.5 कण) को भी मधुमेह, उच्च रक्तचाप व हृदय-रोग से जुड़ा हुआ पाया गया है। शराब-तम्बाकू-धूम्रपान इत्यादि नशीले पदार्थों का सेवन सीधे-सीधे शरीर के अंगों को प्रभावित करता है।
बढ़ती बीमारियाँ और जीनोमिक्स (आनुवांशिकता) की भूमिका
हमारा जीन (DNA) यह निर्धारित करता है कि हम इन बीमारियों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जीन के कारण हृदय-रोग या मधुमेह के प्रति पहले से ही थोड़ा कमजोर होते हैं। जीनोमिक परीक्षण ऐसे जोखिमों को पहचानने में मदद कर सकता है, ताकि हम समय रहते इन बीमारियों से बचाव कर सकें।
पर्यावरण-जीवनशैली-जीन त्रिकोण : अपने रोज़मर्रा के जीवन में हम जिन खतरों (जैसे भोजन, शारिरिक निष्क्रियता, प्रदूषण आदि) के संपर्क में आते हैं, वे भी हमारे जीन को प्रभावित करते हैं और उसकी शक्ति अथवा कमज़ोरी को बढ़ा या घटा सकते हैं। यही कारण है कि आजकल छोटी उम्र में ही जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ देखने को मिल रही हैं।
जीवनशैली का डीएनए, यानी जीन की अभिव्यक्ति पर प्रभाव

असल में, हमारी बदलती जीवन-शैली हमारे डीएनए (जीन्स) को प्रभावित कर रही है, जिसका संबंध विभिन्न तरह की बीमारियों से है। जीवनशैली में बदलाव से सीधे तौर पर हमारे जीन में तो बदलाव नहीं होता (यानि डीएनए अनुक्रम नहीं बदलता), लेकिन वे जीन की “अभिव्यक्ति” (gene expression) को अवश्य प्रभावित कर देते हैं। इसे विशेष रूप से एपिजेनेटिक्स (epigenetics) कहा जाता है।
एपिजेनेटिक्स में ऐसा बदलाव होता है जिसके कारण जीन बिना डीएनए सीक्वेंस बदलें “चालू” (on) या “बंद” (off) हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, हमारी डाइट, व्यायाम, वायु-प्रदूषण, धूम्रपान, तनाव, नींद की कमी आदि कारक DNA मेथाइलेशन (methylation) या हिस्टोन मॉडिफिकेशन (histone modification) जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं। शोध बताते हैं कि उच्च वसा वाला आहार, कम व्यायाम, या प्रदूषण जैसे कारक जीन अभिव्यक्ति व मेथाइलेशन पैटर्न को मेटाबॉलिक ऊतकों (जैसे मांसपेशी, चर्बी / एडिपोज ऊतक) में बदल देते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बदलती जीवन-शैली से एपिजेनेटिक बदलाव आता है, फिर इससे जीन अभिव्यक्ति में परिवर्तन होता है, और फिर इसका सीधा प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है।
जीन व जीवनशैली के कारण बढ़ने वाली बीमारियाँ
जब जीन का कार्यप्रवाह (gene function) और उसकी अभिव्यक्ति (expression) बदल जाते हैं, तो निम्न प्रकार की बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है :
मधुमेह (टाइप 2), मोटापा, मेटाबॉलिक सिंड्रोम — उदाहरण के लिए, “एपिजेनेटिक रेगुलेशन मेटाबॉलिक डिजीज़” पर हुए शोध बताते हैं कि इसके पीछे DNA मेथाइलेशन, हिस्टोन मॉडिफिकेशन आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
हृदय-वायु सम्बन्धी रोग (Cardiovascular diseases), उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक — जब जीवनशैली से जुड़े कारक, यानी अस्वास्थ्यकर भोजन, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव आदि जीन अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं, तो इससे रक्त-संचार प्रणाली पर भी विपरीत असर पड़ता है। इसकी वजह से रक्त प्रवाह, धमनियों और हृदय से जुड़े रोगों की संभावना बढ़ जारी है।
कैंसर व अन्य दीर्घकालीन रोग — जीन अभिव्यक्ति में परिवर्तन से कई प्रकार के कैंसर तथा फेफड़ों और गुर्दे के दीर्घकालीन (क्रॉनिक) रोगों का खतरा बढ़ जाता है। शोधों में पाया गया है कि जब ‘ट्यूमर सप्रेसर’ जीन निष्क्रिय हो जाते हैं या ‘ऑन्कोजीन’ सक्रिय हो जाते हैं, तो कोशिकाएँ असामान्य रूप से बढ़ने लगते हैं और कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
एनए फैटी लिवर रोग (Non-Alcoholic Fatty Liver Disease), मोटापा-संबंधी जटिलताएँ — नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर रोग (NAFLD) और मोटापा-संबंधित जटिलताओं में भी एपिजेनेटिक बदलाव निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारी जीवनशैली ने जीनोमिक संवेदनशीलता (genetic susceptibility) के साथ मिलकर गंभीर बीमारियों के खतरे को बढ़ा दिया है।


हम क्या कर सकते हैं? — बचाव के उपाय
अभी तक हुए शोधों से यह स्पष्ट हो गया है कि हमारी दिनचर्या हमारे जीनों के “ऑन” या “ऑफ” होने की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। इसलिए, जीवनशैली में किए गए छोटे-छोटे नवाचार स्वास्थ्य की दृष्टि से बड़े परिणाम ला सकते हैं। इस दृष्टि से भोजन में हरी सब्जियाँ, फल, साबुत अनाज, दाल-चना आदि को शामिल करें। फास्ट-फूड, मीठे-शुगरयुक्त पेय और फ्राइड चीजों को कम करें। नमक-शक्कर-वसा को नियंत्रण में रखें। घर के कामों में भाग लें, प्रतिदिन कम-से-कम 30 मिनट तेज़ गति से चलें, साइकिल चलाएँ, योग करें या किसी खेल-गतिविधि में भाग लें। इसके अलावा, माइक्रो-ब्रेक्स को अपनाएँ। लगातार बैठे रहने की आदत मांसपेशियों को कमज़ोर करने के साथ-साथ जीनों की कार्यप्रणाली को भी निष्क्रिय बना सकती है। इसलिए लंबे समय तक बैठे रहने से बचें और हर एक-दो घंटे में कुछ मिनट स्ट्रेचिंग या हल्की फिजिकल एक्सरसाइज करें। इससे शरीर पुनः सक्रिय मोड में लौट आता है।
साथ ही साथ, नियमित स्वास्थ्य-जाँच करवाते रहें, विशेष तौर पर ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल इत्यादि की जाँच। यदि परिवार में किसी को डायबिटीज या हृदय-रोग है, तो सावधानी रखना और ज़रूरी हो जाता है (जीन-सेंसेटिविटी के चलते)। तनाव भी हृदय व चयापचय पर असर डालता है। इसलिए पर्याप्त नींद लें और तनाव-मुक्त जीवनशैली अपनाएँ। यदि वायु-प्रदूषण ज़्यादा हो रहा हो, तो बाहर कम जाएँ, मास्क पहनें, संभव हो तो घर में एयर-प्यूरिफायर का इस्तेमाल करें और अधिक से अधिक पौधे लगाएँ। अपने आसपास के लोगों को भी जीवनशैली में बदलाव के लिए प्रेरित करें। बच्चों में स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक आदतें डालना भी बहुत मायने रखता है, क्योंकि कल वो समाज के स्तंभ होंगे और खुद के स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक स्वास्थ्य प्रणाली को भी प्रभावित करेंगे।
बीमारियों से बचने में जीनोमिक्स (Genomics) की भूमिका

यहाँ “जीनोमिक्स” का तात्पर्य हमारी जीन (DNA) की विविधताएँ (genetic variants), जीन अभिव्यक्ति के पैटर्न, और एपिजेनेटिक मार्कर्स को समझने से है, जिससे हम रोगों की रोकथाम, पहचान, और उपचार बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
जोखिम की पहचान (Risk Stratification)
प्रत्येक व्यक्ति में जीनोमिक विविधताएँ होती हैं — कुछ जीन वेरिएंट्स हमें किसी रोग के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं। साथ ही, यदि हम यह जान लें कि हमारे जीवनशैली कारक (diet, exercise, pollution exposure, etc.) क्या हैं, तो पहले से यह अनुमान लगा सकते हैं कि हमें कौन सी बीमारी का खतरा है। उदाहरण के लिए, जीनोमिक परीक्षण और एपिजेनेटिक मार्कर्स की सहायता से यह पता लगाया जा सकता है कि कौन से जीन “आसान” परिस्थितियों में सक्रिय हो सकते हैं।
निजी जीवनशैली में हस्तक्षेप (Personalised lifestyle interventions)
जीनोमिक व एपिजेनेटिक जानकारी के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि व्यक्ति को किन चीजों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हर व्यक्ति का जीनोमिक ढांचा अलग होता है और शोध बताते हैं कि व्यायाम और भोजन से होने वाले एपिजेनेटिक लाभ हर व्यक्ति के लिए अलग अलग हो सकते हैं। यही विविधता हमारे शरीर की प्रतिक्रियाओं, रोग-प्रवृत्तियों और उपचार की प्रभावशीलता को निर्धारित करती है। वैज्ञानिक इसे रिस्क स्कैनिंग (Risk Stratification) कहते हैं। इसमें किसी व्यक्ति के जीन वेरिएंट्स और उसकी जीवनशैली से जुड़े डेटा (जैसे आहार, नींद, प्रदूषण, गतिविधि आदि) को मिलाकर यह समझा जा सकता है कि उसे भविष्य में किन बीमारियों का अधिक खतरा हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति में इंसुलिन-रेज़िस्टेंस या हृदय रोग से संबंधित जीन वेरिएंट्स पाए जाते हैं, तो उसकी जीवनशैली और आहार में प्रारम्भिक बदलाव करके रोग की संभावना को कम किया जा सकता है।
उपचार व प्रबंधन (Clinical applications)
जीनोमिक्स व एपिजेनेटिक मार्कर्स द्वारा यह जानकारी मिल सकती है कि किस रोग के विकास की शुरुआत कहाँ हो रही है। इससे समय पर हस्तक्षेप करना संभव हो सकता है। यही नहीं, एक ही तरह के रोग से ग्रस्त सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसा ईलाज निर्धारित करने की बजाए अब हर व्यक्ति के लिए ‘पर्सनलाइज्ड इंटरवेंशन’ की संभावना पैदा हो गई है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति के जीनोमिक और एपिजेनेटिक प्रोफाइल के अनुसार ईलाज और डाइट-प्लान तैयार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक तरह के जीन वेरिएंट्स वाले व्यक्तियों में Mediterranean Diet (जिसमें जैतून का तेल, फल, सब्ज़ियाँ और साबुत अनाज शामिल होते हैं) फायदेमंद होती है, तो किसी दूसरे जीन प्रोफाइल वाले व्यक्ति के लिए प्रोटीन-समृद्ध आहार अधिक प्रभावशाली हो सकता है। इसके अतिरिक्त, भविष्य में एपिजेनेटिक-ड्रग्स या जीनोमिक-सपोर्टेड चिकित्सीय उपाय भी विकसित किए जा सकते हैं, जो जीन अभिव्यक्ति को स्वस्थ-तर्रार बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
निष्कर्ष
हमारी बदलती जीवन-शैली (खान-पान की आदतें, व्यायाम-घाट, प्रदूषण, तनाव आदि) सीधे तौर पर जीन के कार्य को प्रभावित करती है। यह डीएनए को नहीं बदलती, लेकिन जीन अभिव्यक्ति को बदल देती हैं (एपिजेनेटिक रूप से)। ये बदलाव विभिन्न रोगों, विशेषकर मधुमेह, हृदय-रोग, मोटापा-संबंधी रोग, कैंसर आदि के जोखिम को बढ़ा देते हैं। लेकिन संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, प्रदूषण-नियंत्रण, जीनोमिक जागरूकता और सही जीवनशैली अपनाकर हम अपनी एवं अपने प्रियजनों की सेहत को बेहतर बना सकते हैं। जीनोमिक्स (genomics) हमें यह समझने में सक्षम बनाती है कि हमारे जीन व अभिव्यक्ति का पैटर्न क्या है, और इसे जीवनशैली के अनुरूप कैसे बदल सकते हैं।
इस तरह जीवनशैली में सुधार और जीनोमिक की जानकारी मिलकर बीमारियों की रोकथाम और स्वास्थ्य-सुधार का सशक्त तरीका साबित हो सकता है।
- डॉ. रेनू यादव
सीनियर डिमॉन्स्ट्रेटर, पी.जी.आई.एम.ई.आर., चंडीगढ़;
ई-मेल: renu21835@gmail.com; फोन : +917015665504

