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होरमुज़ जलडमरू बंद हुआ तो भारत पर भी पड़ेगा गंभीर असर

Posted on June 24, 2025June 24, 2025 by अविनाश सैनी (संपादक)

ईरान इज़राइल के बीच चल रहे युद्ध में अमेरिका की एंट्री के बाद ईरान ने दुनिया में तेल परिवहन के सबसे प्रमुख रास्ते, यानी होरमुज़ जलडमरू को बंद करने की धमकी दे डाली। ईरान की संसद ने इस आशय का प्रस्ताव पास कर दिया, जो कि काफी गंभीर बात कही जा सकती है। अगर होरमुज़ जलडमरू को बंद हो जाता है तो भारत सहित दुनिया के देशों पर, उनकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? होरमुज़ जलडमरू के बंद करने की धमकी से दुनिया के देशों को क्यों पसीना आ रहा है? इसकी घोषणा के बाद से ही शेयर बाजार क्यों गोते खा रहा है? आइए, इन सब बिंदुओं पर क्रमवार बात करते हैं।

क्या है होरमुज़ जलडमरू :
होरमुज़ जलडमरू वास्तव में होरमुज़ जलसन्धि (Strait of Hormuz) को कहा जाता है — यह फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी, यानी अरब सागर को जोड़ने वाला एक बहुत ही संकरा और रणनीतिक जलमार्ग है। इसे ओरमुज जलडमरूमध्य भी कहा जाता है। यह ईरान और ओमान के बीच में स्थित है, और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है।

भौगोलिक स्थिति :
होरमुज़ जलडमरू मध्य फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है, जो पश्चिम में ईरान और पूर्व में ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से घिरा है।

यह क्यों इतना महत्वपूर्ण है :
marketwatch.com, indianexpress.com सहित अन्य न्यूज़ चैनलों की मानें तो, दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20% और एलएनजी का 20–25% व्यापार इसी रास्ते से होता है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सन 2024 और 2025 की बात करें तो हर रोज़ लगभग 20 मिलियन बैरल तेल यहाँ से गुज़रता है। कुलमिलाकर, यह जलडमरू मध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, क्योंकि इसके माध्यम से फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है।

भौगोलिक रुकावट :
होरमुज़ जलडमरू में सबसे संकरी जगह मात्र 33 किलोमीटर चौड़ी है, जबकि यातायात की लेन केवल 3 किलोमीटर है। इस संकरेपन के कारण इसे जैसे बारूदी सुरंगों, मिसाइलों या जहरीले अवयवों आदि आसानी से रोका जा सकता है।

वैकल्पिक मार्गों की कमी :
होरमुज़ जलडमरू बंद होने पर दुनिया के पास मध्य एशिया से तेल आयात के क्या विकल्प मौजूद हैं, यह जानना भी महत्वपूर्ण है। इस नज़र से देखें तो दुनिया के पास सऊदी अरब (East‑West पाईपलाइन) और यूएई (Fujairah पाईपलाइन) जैसे कुछ सीमित विकल्प ही मौजूद हैं, परन्तु इनके माध्यम से भी प्रतिदिन केवल ~2.6 मिलियन बैरल तेल का परिवहन ही संभव है, जो काफी सीमित क्षमता है। इसके अलावा, अन्य मार्ग (केप ऑफ़ गुड होप, सूएज़) महंगे और समय लेने वाले हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव :
निश्चित तौर पर दुनिया के अनेक देशों में तेल की किल्लत होगी और कीमतों में उछाल आएगा। इससे वैश्विक आर्थिक वृद्धि धीमी होगी व मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी। वाशिंगटन पोस्ट (washingtonpost) और रॉयटर्स (reuters) के अनुसार अचानक आए संकट में कच्चे तेल की कीमतें 74–80 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक तक जा सकती हैं। कुछ विश्लेषकों के अनुसार तो यह कीमत 120–150 डॉलर तक भी जा सकती हैं। यदि होर्मुज जलडमरू बाधित होता है तो दुनिया भर के देशों में पेट्रोल-डीज़ल की किल्लत बढ़ जाएगी और आर्थिक गिरावट आएगी।
एशिया की बात करें, तो भारत के साथ-साथ चीन, जापान, दक्षिण कोरिया आदि एशियाई देश भी इससे वविशेष रूप से प्रभावित होंगे — क्योंकि अधिकांश तेल इन्हीं देशों को जाता है।

मध्य पूर्व के देशों को भी नुकसान :
होरमुज़ जलडमरू के बंद होने से शेष विश्व के साथ-साथ मध्य-पूर्व के देशों को भी नुकसान होगा। यहां तक कि खुद ईरान भी अपने तेल निर्यात के अवसर गँवा देगा क्योंकि उसका एक बड़ा हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर जाता है।

विशेष रूप से भारत पर असर :
महंगाई व मुद्रास्फीति बढ़ेगी, GDP में गिरावट आ सकती है –
भारत पर होरमुज़ जलसन्धि (Strait of Hormuz) के संभावित बंद होने का गहरा और बहुआयामी असर पड़ सकता है।

भारत की प्रत्येक दिन लगभग 5.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल की खपत होती है, जिनमें से लगभग 2 मिलियन बैरल तेल होरमुज़ जलडमरू के रास्ते मध्य पूर्व से आता है। यानी भारत की ज़रूरत का लगभग 36–40% तेल इसी रास्ते से आता है। (economictimes, indiatimes, drishtiias.com, economictimes) यदि ईरान होरमुज़ जलडमरू को रोक देता है, तो भारत जैसे देशों में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी, मुद्रास्फीति बढ़ेगी और आर्थिक गिरावट आएगी। मोटे तौर पर कच्चे तेल में हर $10 की बढ़ोतरी भारत की GDP में अनुमानित 0.5% का असर डाल सकती है।इससे रुपया भी कमजोर हो सकता है और बॉन्ड यील्ड्स (सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर) उच्च स्तर पर स्थिर रह सकते हैं। तेल की कीमत बढ़ने से संयुक्त रूप से, गृह उत्पादन लागत, परिवहन लागत और अन्य चीजों की कीमतों में तेजी आएगी, यानी महंगाई बढ़ेगी। इतना ही नहीं, इससे भारत के एक्सपोर्ट में भी अस्थिरता का जोखिम रहेगा। विशेष रूप से चावल और उसमें भी बासमती के निर्यात पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि ईरान एक बड़ा खरीदार है। युद्ध शुरू होने के बाद से ही बासमती की कीमतों में भारी कमी देखने को मिली है। इसके अतिरिक्त, बीमा लागत, जैसे कार्गो इंश्योरेंस, में वृद्धि होना भी तय है।

भारत की रणनीतिक तैयारियाँ :
होरमुज़ जलडमरू की भू-राजनीतिक स्थिति काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र में तनाव और संघर्ष का एक संभावित स्रोत है। इसलिए, संभावित संकट से बचने के लिए भारत सरकार और तेल कंपनियों ने आपूर्ति स्रोत में विविधीकरण पर काम किया है।

इस रणनीति के तहत भारत ने कच्चे तेल के कुल आयात का करीब 40% हिस्सा रूस से खरीदना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, हम अमेरिका, पश्चिमी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी तेल आयात करते हैं। यही नहीं, हम कंटिंजेंसी पूलों और रणनीतिक भंडारों को भी सक्रिय रूप से तैयार रखते हैं—तेल कंपनियों के पास कुछ हफ्तों का स्टॉक मौजूद है। सरकार एलएनजी (गैस) की आपूर्ति में भी विविधता ला रही है। भारत कतर, ऑस्ट्रेलिया, रूस और अमेरिका से भी एलएनजी खरीदता है, जो इससे अप्रभावित है ।

कच्चे तेल के साथ-साथ रिफाइनिंग सेक्टर और अन्य वस्तुओं के व्यापार पर भी इसका प्रभाव पड़ने लाज़िमी है। इसके लिए IOC, BPCL आदि भारतीय रिफाइनर वैकल्पिक मार्ग तलाश रहे हैं, जैसे पश्चिम अफ्रीका से तेल लाना।

रणनीतिक तौर पर हम राजनीतिक–कूटनीतिक पहल भी कर रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार मध्य पूर्व देशों के साथ संबंध मजबूत कर रही है, ताकि संकट के समय वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। ऊर्जा सुरक्षा नीति को मजबूत करने के लिए भी कूटनीतिक हलकों से सक्रिय संपर्क रखा गया है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और विदेश मंत्री के स्तर पर परामर्श और वार्ताएं जारी हैं। अभी हाल ही में प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति के बीच बातचीत हुई है। इसका असर भी दिखाई दे रहा है। ईरान ने भारतीय नागरिकों को ईरान से बाहर निकालने के लिए विशेष रूप से अपना एयर स्पेस खोला है।

यहां यह भी देखना होगा कि तमाम संकटों के बावजूद होरमुज़ जलडमरू आज तक कभी भी पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है। यहां तक कि 1980–88 और 2011‑12 के दौरान की आपात स्थितियों के बीच भी यह वास्तविक रूप से ब्लॉक नहीं हुआ था। ईरानी संसद का हालिया प्रस्ताव प्रतीकात्मक दबाव का हथियार ही अधिक लगता है।

निष्कर्ष :
होरमुज़ जलडमरू वैश्विक ऊर्जा संरचना की रीढ़ है। यदि यह बंद हुआ, तो तेल और गैस की आपूर्ति में भारी अवरोध, कीमतों में उछाल, और वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेज झटका लग सकता है। हालांकि भारत इस संकट के लिए अपेक्षाकृत तैयार है, क्योंकि उसने आपूर्तियों का निवेश किया है, रणनीतिक भंडार बनाया है, और एलएनजी सप्लाई चेन मजबूत की है। फिर भी, तेल की कीमतों में उछाल, मुद्रास्फीति, रुपये में कमजोरी, और वित्तीय बाजार में अस्थिरता से भारत को भी संक्षिप्त अवधि में आर्थिक और सामाजिक नुकसान झेलने पड़ सकते हैं। सरकार की तत्परता और तैयारी निश्चित तौर पर भारत को इस संकट से बेहतर तरीके से निपटने में मदद करेगी।

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